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द्रोण पर्व
अध्याय १६६
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सञ्जय़ उवाच
कृशाश्वतनय़ा ह्यद्य मत्प्रय़ुक्ता महामृधे |  ३८   क
दर्शय़न्तोऽऽत्मनो वीर्यं प्रमथिष्यन्ति पाण्डवान् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति