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वन पर्व
अध्याय १६६
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अर्जुन उवाच
तथा सहस्रशस्तत्र रत्नसङ्घाः प्लवन्त्युत |  ५   क
वाय़ुश्च घूर्णते भीमस्तदद्भुतमिवाभवत् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति