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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
अहिंसा सर्वभूतेषु धर्मं ज्याय़स्तरं विदुः |  २९   क
तस्य च व्राह्मणो मूलं भवांश्च व्रह्मवित्तमः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति