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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
नैष युद्धेन सङ्ग्रामे जेतुं शक्यः कथञ्चन |  ६७   क
अपि वृत्रहणा युद्धे रथय़ूथपय़ूथपः ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति