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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
सङ्कुले वर्तमाने तु राजा धर्मसुतोऽव्रवीत् |  ४८   क
पाञ्चालानां नरव्याघ्रान्मत्स्यानां च नरर्षभान् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति