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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नस्तु तान्हित्वा तव राजन्रथर्षभान् |  १५   क
यमाभ्यां वारितान्दृष्ट्वा शीघ्रास्त्रो द्रोणमभ्ययात् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति