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वन पर्व
अध्याय १६४
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अर्जुन उवाच
एवमुक्त्वा स मां राजन्नाश्लिष्य च पुनः पुनः |  ६   क
अगच्छत्स यथाकामं व्राह्मणः सूर्यसंनिभः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति