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वन पर्व
अध्याय १६४
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अर्जुन उवाच
एवमुक्त्वा तु मां शक्रस्तत्रैवान्तरधीय़त |  ३१   क
अथापश्यं हरिय़ुजं रथमैन्द्रमुपस्थितम् |  ३१   ख
दिव्यं माय़ामय़ं पुण्यं यत्तं मातलिना नृप ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति