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वन पर्व
अध्याय १६४
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अर्जुन उवाच
तानि दिव्यानि मेऽस्त्राणि प्रय़च्छ विवुधाधिप |  २७   क
लोकांश्चास्त्रजितान्पश्चाल्लभेय़ं सुरपुङ्गव ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति