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द्रोण पर्व
अध्याय १६३
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सञ्जय़ उवाच
स कर्णे साय़कानष्टौ व्यसृजत्क्रोधमूर्छितः |  १८   क
ध्वजे शरासने चैव शरावापे च भारत ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति