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वन पर्व
अध्याय १६२
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वैशम्पाय़न उवाच
पार्थानभ्याजगामाशु देवराजः पुरन्दरः |  ५   क
आगत्य च सहस्राक्षो रथादवरुरोह वै ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति