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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
यमास्थितः सप्त जघान पूगा; न्दितेः सुतानां नमुचेर्निहन्ता |  २३   क
तमिन्द्रवाहं समुपेत्य पार्थाः; प्रदक्षिणं चक्रुरदीनसत्त्वाः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति