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शान्ति पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
भृत्यान्भोगैर्द्विषो दण्डैर्यो योजय़ति सोऽर्थवान् |  १९   क
एतन्मतिमतां श्रेष्ठ मतं मम यथातथम् |  १९   ख
अनय़ोस्तु निवोध त्वं वचनं वाक्यकण्ठय़ोः ||  १९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति