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शान्ति पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
कर्मभूमिरिय़ं राजन्निह वार्त्ता प्रशस्यते |  १०   क
कृषिवाणिज्यगोरक्ष्यं शिल्पानि विविधानि च ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति