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आदि पर्व
अध्याय १६१
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तपत्यु उवाच
का हि सर्वेषु लोकेषु विश्रुताभिजनं नृपम् |  १७   क
कन्या नाभिलषेन्नाथं भर्तारं भक्तवत्सलम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति