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उद्योग पर्व
अध्याय १६०
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सञ्जय़ उवाच
स्ववीर्यं यः समाश्रित्य समाह्वय़ति वै परान् |  ३   क
अभीतः पूरय़ञ्शक्तिं स वै पुरुष उच्यते ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति