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वन पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमेष परिक्रम्य महामेरुमतन्द्रितः |  २८   क
भावय़न्सर्वभूतानि पुनर्गच्छति मन्दरम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति