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वन पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
एतं ज्योतींषि सर्वाणि प्रकर्षन्भगवानपि |  २४   क
कुरुते वितमस्कर्मा आदित्योऽभिप्रदक्षिणम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति