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वन पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
यतय़स्तत्र गच्छन्ति भक्त्या नाराय़णं हरिम् |  २१   क
परेण तपसा युक्ता भाविताः कर्मभिः शुभैः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति