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वन पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
यमाहुः सर्वभूतानां प्रकृतेः प्रकृतिं ध्रुवम् |  १७   क
अनादिनिधनं देवं प्रभुं नाराय़णं परम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति