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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
सर्वथैतदिह श्रुत्वा खड्गसाधनमुत्तमम् |  ८७   क
लभते पुरुषः कीर्तिं प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ||  ८७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति