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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
अग्र्यः प्रहरणानां च खड्गो माद्रवतीसुत |  ८३   क
महेश्वरप्रणीतश्च पुराणे निश्चय़ं गतः ||  ८३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति