आदि पर्व  अध्याय १६०

गन्धर्व उवाच

एवं स तर्कय़ामास रूपद्रविणसम्पदा |  ३१   क
कन्यामसदृशीं लोके नृपः संवरणस्तदा ||  ३१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति