अनुशासन पर्व  अध्याय १६

कृष्ण उवाच

मूर्ध्ना निपत्य निय़तस्तेजःसंनिचय़े ततः |  १   क
परमं हर्षमागम्य भगवन्तमथाव्रुवम् ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति