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द्रोण पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
एवं भीमं समादिश्य स्वरथे समुपाविशत् |  २२   क
अश्रुपूर्णमुखो राजा निःश्वसंश्च पुनः पुनः |  २२   ख
कश्मलं प्राविशद्घोरं दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति