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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैश्रवण उवाच
तमूर्ध्ववाहुं दृष्ट्वा तु सूर्यस्याभिमुखं स्थितम् |  ५३   क
तेजोराशिं दीप्यमानं हुताशनमिवैधितम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति