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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा स धर्मात्मा भ्राता भ्रातरमच्युतम् |  १३   क
अर्थतत्त्वविभागज्ञः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |  १३   ख
विरराम महातेजास्तमेवार्थं विचिन्तय़न् ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति