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द्रोण पर्व
अध्याय १५७
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सञ्जय़ उवाच
एतच्चिकीर्षितं ज्ञात्वा कर्णे मधुनिहा नृप |  ११   क
निय़ोजय़ामास तदा द्वैरथे राक्षसेश्वरम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति