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वन पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
अभितर्जय़मानाश्च रुवन्तश्च महारवान् |  ४९   क
न मोहं भीमसेनस्य ददृशुः सर्वराक्षसाः ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति