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वन पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
महात्मा चारुसर्वाङ्गः कम्वुग्रीवो महाभुजः |  २८   क
रुक्मपृष्ठं धनुः खड्गं तूणांश्चापि परामृशत् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति