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द्रोण पर्व
अध्याय १५६
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वासुदेव उवाच
एकलव्यं हि साङ्गुष्ठमशक्ता देवदानवाः |  १९   क
सराक्षसोरगाः पार्थ विजेतुं युधि कर्हिचित् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति