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वन पर्व
अध्याय १५६
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वैशम्पाय़न उवाच
कुरूणामृषभं प्राज्ञं पूजय़ित्वा महातपाः |  ५   क
सह भ्रातृभिरासीनं पर्यपृच्छदनामय़म् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति