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वन पर्व
अध्याय १५६
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वैशम्पाय़न उवाच
न तात चपलैर्भाव्यमिह प्राप्तैः कथञ्चन |  ३१   क
उषित्वेह यथाकामं यथाश्रद्धं विहृत्य च |  ३१   ख
ततः शस्त्रभृतां श्रेष्ठ पृथिवीं पालय़िष्यसि ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति