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द्रोण पर्व
अध्याय १५५
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सञ्जय़ उवाच
वासुदेवस्तु हर्षेण महताभिपरिप्लुतः |  २   क
ननाद सिंहवन्नादं व्यथय़न्निव भारत |  २   ख
विनद्य च महानादं पर्यष्वजत फल्गुनम् ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति