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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं क्रमेण ते वीरा वीक्षमाणाः समन्ततः |  ६३   क
गजसङ्घसमावाधं सिंहव्याघ्रसमाय़ुतम् ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति