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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
उपर्युपरि शैलस्य गुहाः परमदुर्गमाः |  ३०   क
सुदुर्गमांस्ते सुवहून्सुखेनैवाभिचक्रमुः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति