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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
सलिलावर्तसञ्जातैः पुष्पितैश्च महीरुहैः |  १७   क
समावृतं पुण्यतममाश्रमं वृषपर्वणः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति