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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
परीक्षमाणः पार्थानां कलापानि धनूंषि च |  ४   क
अन्तरं समभिप्रेप्सुर्नाम्ना ख्यातो जटासुरः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति