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द्रोण पर्व
अध्याय १५३
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तेऽप्याय़युर्हत्वा राक्षसान्यत्र सूतजः |  १०   क
नकुलः सहदेवश्च सात्यकिश्च महारथः |  १०   ख
ते कर्णं योधय़ामासुः पाञ्चाला द्रोणमेव च ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति