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उद्योग पर्व
अध्याय १५३
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वैशम्पाय़न उवाच
न हि जातु द्वय़ोर्वुद्धिः समा भवति कर्हिचित् |  ३   क
शौर्यं च नाम नेतॄणां स्पर्धते च परस्परम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति