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वन पर्व
अध्याय १५३
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वैशम्पाय़न उवाच
तरस्वी वैनतेय़स्य सदृशो भुवि लङ्घने |  १९   क
उत्पतेदपि चाकाशं निपतेच्च यथेच्छकम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति