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आदि पर्व
अध्याय १५१
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्य रुधिरं वक्त्रात्प्रादुरासीद्विशां पते |  २४   क
भज्यमानस्य भीमेन तस्य घोरस्य रक्षसः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति