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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
स हन्यमानो नाराचैर्धाराभिरिव पर्वतः |  ९६   क
गन्धर्वनगराकारः पुनरन्तरधीय़त ||  ९६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति