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वन पर्व
अध्याय १५०
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वैशम्पाय़न उवाच
अनुस्मरन्वपुस्तस्य श्रिय़ं चाप्रतिमां भुवि |  १७   क
माहात्म्यमनुभावं च स्मरन्दाशरथेर्ययौ ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति