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कर्ण पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
समाप्तविद्यं तु गुरोः सुतं नृपः; समाप्तकर्माणमुपेत्य ते सुतः |  ४३   क
सुहृद्वृतोऽत्यर्थमपूजय़न्मुदा; जिते वलौ विष्णुमिवामरेश्वरः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति