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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
मा च ते निघ्नतः शत्रून्मन्युर्भवतु भारत |  ५४   क
न तत्र किल्विषं किञ्चित्कर्तुर्भवति भारत ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति