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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं पर्याकुले लोके विपथे जर्जरीकृते |  ५२   क
तैस्तैर्न्याय़ैर्महाराज पुराणं धर्ममाचर ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति