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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
नाघ्नतः कीर्तिरस्तीह न वित्तं न पुनः प्रजाः |  १५   क
इन्द्रो वृत्रवधेनैव महेन्द्रः समपद्यत ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति