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वन पर्व
अध्याय १४९
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वैशम्पाय़न उवाच
मा तात साहसं कार्षीः स्वधर्ममनुपालय़ |  २५   क
स्वधर्मस्थः परं धर्मं वुध्यस्वागमय़स्व च ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति