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वन पर्व
अध्याय १४९
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वैशम्पाय़न उवाच
एष पन्थाः कुरुश्रेष्ठ सौगन्धिकवनाय़ ते |  २२   क
द्रक्ष्यसे धनदोद्यानं रक्षितं यक्षराक्षसैः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति